
NDTV पर सिर्फ दो सेकंड के लिये एक क्लिप दिखाई दी थी......तुरंत ही बदल दी गई लेकिन अपने पीछे वह क्लिप जाने कितने सवाल छोड गई। हुआ यूं कि NDTV पर बिहार में आई बाढ की खबर देख
रहा था....सभी नाम जैसे सुने हुए से लग रहे थे ...फारबिसगंज......पूर्णिया......कटिहार.....अररिया.....ऐसा लग रहा था फणीश्वरनाथ रेणू की कोई किताब पढ रहा हूं , वही लोग.....वही माहौल....... कि तभी अचानक एक क्लिप दिखाई दी जिसमें एक महिला अपने बच्चों के साथ कमर भर पानी में चल रही थी....बगल में उसका पति कोई एकाध साल का बच्चा लिये चल रहा था.....तभी अचानक उस महिला ने अपने पति से वह बच्चा लेने के लिये हाथ बढा दिया ताकि बच्चा उसके पास रहे पति के पास नहीं .......और यही वह क्षण था जो एक ग्रामीण जीवन की झांकी बयां कर गया......। दरअसल इस महिला ने अपने सामने कई लोगों को अचानक देख लिया और उसे ख्याल आया कि वह तो छूछे हाथ चल रही है...खाली हाथ चल रही है और उसका पति हाथ में बच्चा उठाये चल रहा है....कोई देखेगा तो क्या सोचेगा.......पति मेहरबसुआ है, .....पत्नी आराम से चल रही है खाली हाथ, और खुद पति बच्चा लिये चल रहा है.....मेहरी की सेवा कर रहा है...। नाव पर जा रहे लोगों को देखते ही शायद उस महिला के अंतर्मन में यह बात कौंध गई थी और उसने अचानक ही बच्चे को अपने पति के हाथ से ले लेना चाहा.....।
लेकिन यहां ध्यान देने की बात यह है कि उस महिला द्वारा अपने पति को लोगों की नजरों में पौरूखमय पति दिखाने की बात, उसका मान रखने की बात यूं ही नही आई होगी, इसके पीछे भारतीय ग्राम्य संस्कार थे जो उसे ऐसा करने के लिये मजबूर कर रहे थे......आज भी भारतीय संस्कारों में गुंथी पत्नी कभी भी दूसरों के सामने अपने पति से खुलकर बात नहीं करती , कभी बुलाना हो तो दरवाजे की सांकल खटखटाती है या फिर चूडी ताकि पति मौक निकालकर लोगों के बीच से उठ कर आ जाय और उसकी बात को भी सुने पति भी कभी खुलकर दूसरों के सामने अपने बच्चों से प्यार नहीं करता , बडों का लिहाज करता है...कि लोग देखेंगे तो क्या सोचेंगे ........ यह और इस तरह की कई बातें मुझे अचरज में डाल देती हैं......ऐक ओर कंधे से कंधा मिलाकर चलने की बात हो रही है, पति के साथ पत्नी भी ऑफिस जा रही है, पत्नी कहीं किसी कंपनी में MD है....कही CEO है तो दूसरी ओर यह अचरज भरी सांकल की खटकन.....लग रहा है जैसे अतीत और वर्तमान के बीच ऐक कशमकश चल रही है......और शायद इसे ही कहते हैं - भारत बनाम भारत या फिर......... इंडिया बनाम भारत।
- सतीश पंचम
लेकिन यहां ध्यान देने की बात यह है कि उस महिला द्वारा अपने पति को लोगों की नजरों में पौरूखमय पति दिखाने की बात, उसका मान रखने की बात यूं ही नही आई होगी, इसके पीछे भारतीय ग्राम्य संस्कार थे जो उसे ऐसा करने के लिये मजबूर कर रहे थे......आज भी भारतीय संस्कारों में गुंथी पत्नी कभी भी दूसरों के सामने अपने पति से खुलकर बात नहीं करती , कभी बुलाना हो तो दरवाजे की सांकल खटखटाती है या फिर चूडी ताकि पति मौक निकालकर लोगों के बीच से उठ कर आ जाय और उसकी बात को भी सुने पति भी कभी खुलकर दूसरों के सामने अपने बच्चों से प्यार नहीं करता , बडों का लिहाज करता है...कि लोग देखेंगे तो क्या सोचेंगे ........ यह और इस तरह की कई बातें मुझे अचरज में डाल देती हैं......ऐक ओर कंधे से कंधा मिलाकर चलने की बात हो रही है, पति के साथ पत्नी भी ऑफिस जा रही है, पत्नी कहीं किसी कंपनी में MD है....कही CEO है तो दूसरी ओर यह अचरज भरी सांकल की खटकन.....लग रहा है जैसे अतीत और वर्तमान के बीच ऐक कशमकश चल रही है......और शायद इसे ही कहते हैं - भारत बनाम भारत या फिर......... इंडिया बनाम भारत।
- सतीश पंचम
| कुछ महीने पहले लिज् हर्ले अपने भारतीय पति अरूण के साथ भारत आई थी, जहां जाती थी..पूरा मिडिया लेकर चलती थी, बगल में एक बच्चा लटका कर उसका पति इस तरह मुस्कराता मानों जग जीत लिया हो....सभी कैमरे उसकी मुस्कान कवर करते नहीं थकते थे, और वो हर्ले तो इस पति को लेकर इस तरह खुश थी मानो सब को यही दिखाने आई है.......उधर बिहार में जैसे ही कैमरा सामने आया...महिला ने झट बच्चा अपने पति से ले लिया.......लाज के मारे। |


16 Comments:
maan gaye aapko.aap khabhar dekhte nahi samajhate hai,warna aaj khabar sirf aur sirf dekhne ki chij ho gayi hai,apka vishleshan bhi sateek hai. bahut achhe satish jee
सतीश जी आपने ऐसे क्षण को पकडा है जिसे हम लोग दैनिक
जीवन में रोज देखते होंगे पर ध्यान नही दे पाते ! आपकी
नजर वाकई पैनी है ! धन्यवाद !
रहा सवाल भारत बनाम भारत या इंडिया बनाम भारत।
का तो मैं आपसे इंडिया बनाम भारत पर सहमत हूँ !
आज सुबह सुबह पहला ही लेख आपका पढा है !
और यकीन मानिए की ...बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर
दिया ! सुन्दरतम लेख !
वाह, मेहरा तो सुना प्रयोग किया था - नारियों की संगत में ठिले रहने वाले के लिये। पर मेहरबसुआ तो मस्त है।
जौन मेहरबसुआ न होइ, हाथ उठाये इमानदारी से!
(कोई न उठा हाथ!)
Bilkul sahi kaha aapne, yah sanskaron ki baat hai, lekin sanskar bhi to gaon men hi bache rah gaye hain. Shahron men to yah dikhna durlabh hai.
बहुत बारीक पकड़
मुस्कुरा रहा हूँ. एक सेध में दो सभ्यताएं...
सतीश भाई, बड़ी पारखी निगाहें हैं आपकी।
यथार्थवादी पोस्ट...बिल्कुल सही लिखा है आपने.
नीरज
कुछ समय पहले एक महिला अपने भारतीय पति के साथ भारत आई थी, जहां जाती थी..पूरा मिडिया लेकर चलती थी, बगल में एक किलहटी की तरह बच्चा लटका कर उसका पति इस तरह मुस्कराता मानों जग जीत लिया हो....सभी कैमरे उसकी मुस्कान कवर करते नहीं थकते थे, और वो महिला तो जैसे इस लपूझन्ने को लेकर इस तरह खुश थी मानो सब को यही दिखाने आई है.......उधर बिहार में जैसे ही कैमरा सामने आया...महिला ने झट बच्चा अपने पति से ले लिया.......लाज के मारे।
यह कमेंट देना इसलिये जरूरी समझा क्योंकि मूल पोस्ट में यह Table Addition अभी अभी जोडा है.....असुविधा के लिये आप सभी से माफी चाहूं
मैंने भी कुछ देखा था सतीश जी ......एक २४ साल का नौजवान अपने बूढे बाप को साईकिल पर बिठकर कई घंटो से चल रहा है ओर उसकी बूढी माँ हाथ में बकरी थामे साथ साथ .....
kafi gahari baat likhi aapne wo bhi ek jhalak dekhkar.abhgi yah sab badalane me samay lagega.
wakai us do second ki clip mein aapne bahut gahri baat pakdi hai..yadi dhyaan na diya jaaye to ek saamany baat hai kintu socha jaye to ek graameen mahila ki poori maansikta ko kholkar rakh deti hai.
सतीश पंचम,यही वो क्षण हे जो भारत को दुसरो से ऊचा उठाते हे, ओर हमे सर उठा कर कहने मे शर्म नही आती की यही पहचान हे भारत की नारी की जो पुर जीवन ही अपने परिवार पर नोछावर कर देती हे, इसी लिये पुजयनीया भी हे.
धन्यवाद
kamaal ka likha hai aapne. stri kitna karti hai aur kitna sochti hai parivar ke liye kai baar andekha rah jaata hai. uska stritva hi to purush ko purush banata hai.aisa accha likhne ke liye hardik badhai
sachhai
बरी पैनी नज़र के मालिक हैं श्रीमान, मुबारक हो और लेखन भी बाँध लेने वाला है i इसी तरह लिखते रहिये I
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