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Sunday 1 November 2009

क्या हिंदी पट्टी के पत्रकारों के वजह से देश में हिंदी प्रदेशों की गलत छवि बन रही है ?

      मेरा मानना है कि हिंदी पट्टी के मीडिया कर्मी ज्यादा संख्या में होने से एक प्रकार की मुसीबत सी हो रही है। एक इमेज सी बनती जा रही है यू पी बिहार के बारे में कि ये लोग ऐसे होते हैं..वैसे होते हैं। रहने का ढंग नहीं जानते है आदि...आदि...।

       अब इसे मैं एक प्रकार का दुर्भाग्य ही मानूंगा कि हिंदी पट्टी के ज्यादातर लोग नेशनल न्यूज चैनलों में हैं। अक्सर न्यूज जब भी बिहार के बारे में चलाई जाती है तो एक दरिद्रता का वरक लपेट कर पेश की जाती है। लेकिन बार बार इन्ही प्रदेशों से खबरे दिखाये जाने पर एक प्रकार की नेगेटिव इमेज बनना लाजिमी है।

     सवाल यह उठता है कि क्यों कैमरा हिमाचल को फोकस नहीं कर पाता....क्यों कैमरा तमिलनाडु या उडीसा को फोकस नहीं कर पाता। क्या देश के बाकी इलाके अपने खान पान और साडी-मीनाकारी-पच्चीकारी वगैरह दिखाने के लिये ही बने हैं। क्या बाकी जगह कैमरा यही बताने के लिये है कि कन्याकुमारी का यह पेय फेमस है, केरल की यह कला उत्तम है……क्या वहां खबरें नहीं होती….वहां मर्डर या अपराध नहीं होते ? क्या वहां कोई अप्रिय घटना नहीं घटती ?

        कभी रूट लेवल पर काम करते हुए कैमरे का फोकस एडजस्ट किया जाय तो देश में दिखाने के लिये बहुत कुछ है। लेकिन हिंदी पट्टी के होने के कारण पत्रकार भी अपने क्षेत्र से हट नहीं पाते और बार बार घोल-घाल कर वही सब दिखाते रहते हैं। यह इमेज ही है जिसके कारण हिंदीभाषी अक्सर अपमानित होने को अभिशप्त होते जा रहे हैं। उधर राजू श्रीवास्तव जैसों के गंवई चुटकुले भी हिंदी पट्टी को एक लंठ मान पेश किये जाते हैं। जब कोई इन प्रदेशों से कहीं नौकरी आदि के लिये जाता है तो उसे अन्य समस्याओं के अलावा एक नेगेटिव छवि को लेकर भी चलना पडता है।

नेगेटिव इमेज बनने का एक उदाहरण और ।

         जब सुबह टीवी ऑन करो तो सबसे पहले गुडगांव या नोयडा की खबर होती है कि वहां फलां ट्रक लुढक गया या फलां एक्सिडेंट हो गया या कि फलां जगह वारदात हुई है। अब चूँकि नोयडा या गुडगांव का रास्ता मिडिया वालों के रास्ते में पडता है तो सुबह सुबह न्यूज चलनी शुरू हो जाती है औऱ वह भी ब्रेकिंग न्यूज का ठप्पा लगाये।  तो इमेज ये बन रही है कि नोयडा-गुडगांव काफी असुरक्षित है...जबकि लोग यह नहीं सोच पाते कि आखिर सुबह सुबह न्यूज पहले वहीं की क्यों फ्लैश होती है।

     मैं पत्रकारिता से नहीं जुडा हूँ, न ही मैं कभी गुडगांव या नोयडा गया हूँ। लेकिन जिस तरह से चींटियों की कतार देख कर अनुमान लगाया जा सकता है कि वहां चींटियों का घर होगा और उसके कतार की दिशा में ही कोई मीठा या खाने योग्य सामग्री है तो उसी आधार पर कह रहा हूँ कि मीडिया तंत्र का जमावडा एक गुच्छे के रूप में जरूर नोयडा या गुडगांव के आसपास है। आधुनिक शब्दावली में इसे ही हब कहा जाता है। चींटियो की कतार अपने आवागमन से सुबह छह बजे खुद ही लाईव हो जाती है :)

      यूं तो हर गली या मुहल्ले में मीडिया वाले मिल जाएंगे लेकिन नेशनल लेवल पर कोई तुरंता प्रसारक या OB Van उनके लिये शायद उस हद तक उपलब्ध न हो। अगर हो भी तो इतना दबाव तो नहीं ही होगा कि कोई नई खबर जल्दी फ्लैश करो...... जबकि हब होने से गुडगांव या नोयडा इस मामले में प्रसारण कर देते हैं। इन मुद्दों पर थोडा सा ध्यान भर देने की जरूरत है। बाकी चीजें तो खुद ब खुद समझ आ जाएंगी।

     और अंत में शरद जोशी के लापतागंज की तर्ज पर मीडिया के बारे में अपने शब्दों में कहूं तो

-   यहां सब बिज्जी हैं..... थोडा सा ध्यान दिया जाय तो बिज्जीपन नजर आ जाता है कि कितने बिज्जी है :)


( यह लेख मैने रवीश जी की एक पोस्ट में जो टिप्पणी दी थी उस पर आधारित है । इस मुद्दे पर चर्चा, प्रतिक्रिया आदि को जानने के लिये रवीश जी के ब्लॉग में जाया जा सकता है । मैं यहां व्यक्तिगत होकर पोस्ट नहीं लिख रहा हूँ बल्कि इस पोस्ट को समस्त नेशनल ( ? )  हिंदी पट्टी के पत्रकारों के लिये  ही समझा जाय । रवीश जी के बोलने बताने के तौर तरीकों को मैं भी काफी पसंद करता हूँ, लेकिन कहीं न कहीं यह मुद्दा रह रह कर मन में  करक रहा था, सो पोस्ट के रूप में लिख रहा हूँ  )

 - सतीश पंचम

बातें, जो जाने की जल्दी मचा रही हैं.....

कुछ बातें जल्दी मचाती हैं कि मैं जा रही हूँ......मैं न रूकूंगी। समय भी उन्हें ऐसा करने के लिये उकसाता रहता है कि कह दो कि देर हो रही है.......बहुत रूक लिये......हम जा रही हैं........अब न रूकेंगी.............ऐसी ही बातों को देखने पढने के लिये इस राह से गुजर सकते हैं जहां समय को एकबारगी धकियाया जा सकता है कि समय तुम बीत गये तो क्या हुआ ? ठहरने की सांकल तो अब भी खटखटायी जा सकती है......

ऐसी ही बीते-अनबीते पलों को इन लिंक्स के जरिये देखा जा सकता है ।

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