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Sunday, 19 July, 2009

हंस में छपी एक कहानी 'बुजरी' में आई ए एस अफसर सी. प्रसाद की रोचक कथा


हंस के जुलाई 09 अंक में एक दिलचस्प कहानी पढी है ‘बुजरी’ ( एक प्रकार की अवधी गाली)। लेखक हैं अरूण कुमार। कहानी के अनुसार एक आई ए एस अधिकारी सी. प्रसाद जिलाधीश बनकर आते हैं। उनके आने से पहले ही जिलाधिकारी के चपरासी से लेकर बाबू तक में उनके बारे में चर्चा चल पडती है।

चपरासी रामदीन ने पूछा – क्या बाऊ साहब! नये साहब कौन चोला हैं ?

जवाब मिला - नाम तो है सी. प्रसाद। कायस्थ ही होंगे। बडे अफसरों में सरनेम न लगाने का प्रचलन आ गया है।

अरूण कुमार आगे लिखते हैं – डी एम साहब के आने से पहले ही दो बातें मशहूर हो चुकीं थीं। पहली यह कि साहब बहुत सख्त अफसर हैं और दूसरी यह कि वे बहुत इमानदार हैं। वैसे ये दोनों बातें अक्सर अफसर के जिले में पहुँचने से पहले ही पहुँच जाया करती हैं। चाहे बाद में उससे बढकर चूतिया और बेईमान कोई और न रहा हो।

खैर, जिलाधिकारी सी. प्रसाद आते हैं। रंग उनका करिया भुजंग है। सहबाईन गोरी चिट्टी है। और साथ में है एक उंचा तगडा काला कुत्ता रूस्तम । जिले भर के सभी अफसर मिलने आते हैं। जो कोई साहब से मिलता उसको कुत्ता सूंघता और कपडों पर लार चुआ देता। लेकिन अफसर लोग थे कि कुत्ते रूस्तम की तारीफ करते नहीं थकते। एसडीम ने पूछा ये कौन सा डॉग है।

डॉग नहीं ये मेरा बेटा है। डोंट से डॉग । यू में से डॉगी। डॉगी इस मोर एप्रोप्रियेट वर्ड । दिस इज रॉटवेलर।

सुनकर उदासीन भाव से एस पी साहब ने कहा – लखनऊ में हमारे आई जी साहब के पास भी रॉटवेलर था। उनकी बात को डीएम साहब ने अनसुना कर दिया। वैसे भी आईएएस और आईपीएस अफसरों में पटती नहीं है। डीएम सोचते हैं अब बच्चू को हर बैठक में तलब करूँगा और तब पता चलेगा कि जिले का बादशाह डीएम ही होता है।

यहाँ लेखक अरूण कुमार ने मार्के की बात कही है कि - वैसे भी आईएएस और आईपीएस अफसरों में पटती नहीं है।

कहानी आगे बढती है। मेल मुलाकात के बाद चालाक चपरासी रामदीन कहता है – हुजूर, घर में हवन वगैरह करवा लिया जाय तो अच्छा होगा। मैं पंडित रामशंकर सुकुल को ले आया हूं।

जरूरत नहीं।

हुजूर को पता ही है कि पहले कोठी में माजिद हुसैन साहब रहा करते थे। रोजै बकरा कटता रहा। मुंडेरन पर चील कौव्वों की फौज जमा रहती थी। हवन हो जाता तो अच्छा था।

सहबाईन हवन करवाने मान जाती हैं। एक हजार रूपया चपरासी रामदीन के हवाले कर चल देती है। उन लोगों के जाने के बाद बाबू लोग आपस में मजाक करते हैं।

क्यों बे रामदीनवा । जो भी साहब आता है सबको सलाह देता है । पहले जब माजिद हुसैन साहब आये तो उनको इसने सलाह दी थी कि पहले यहां रामभरोसे भीम रहते थे। कोठी में प्रवेश से पहले फातिहा पढवा लें। और मौलाना को पकड लाया था।

सुनकर रामदीन खीं खीं कर रह जाता है। पंडित से कहता है – आप चलो पंडित जी। आपको कोठी से जल औऱ पुष्प भर मिलेगा। अच्छत, दूरबा, कुस, रोली, मौली, जनेऊ...आप ही को लाना है। उधर पंडित अंगूठे और तर्जनी अंगुली रगडते हुए रामदीन को इशारा किया कि कुछ मिल जाय।

यह देख रामदीन कहता है – इसारेबाजी कर रहे हो। हम तुम्हारा कितना ध्यान रखते हैं. लेकिन पंडित था कि टल नहीं रहा था । सो रामदीन कहता है – लां..... न चाटो पंडित। सायकिल पर चूतड धरो और निकल लो।

यहां हवन फातिहा वाला प्रसंग देख कर लगता है कि लेखक अरूण कुमार का पाला इस तरह के कैरेक्टरों से पड चुका है वरना यह हवन-फातिहा वाला महीन भेद खोलना आसान नहीं है।

इधर सी. प्रसाद, आई ए एस, जिलाधिकारी खादिमपुर का कुत्ता रूस्तम बेचैन रहने लगता है। वह कई लोगों को काट लेता है। डॉक्टरों ने बताया कि कुत्ते को जोडा खाना पडेगा ( कुतिया से संबंध बनाना पडेगा) तब जाकर कुत्ता सामान्य हो पायेगा. लेकिन सी. प्रसाद, आई ए एस के कुत्ते के जोड की कुतिया हो तब न। सभी अफसरान दौडे, कहां- कहां से कुतियों के बारे में लिस्ट निकाल लाये पर सी. प्रसाद को एक भी कुतिया अपने रॉटवेलर कुत्ते के बराबर की न लगी।

इसी बीच सी. प्रसाद को खबर मिलती है कि उनके पिता गाँव में बीमार हैं। लेकिन गाँव छोडे भी तो सी. प्रसाद को बारह साल हो गये हैं। IAS बनने के बाद सी. प्रसाद ने दिल्ली में ही एक गोरी चिट्टी को फांस लिया था जिसके दम पर पोस्टिंग मिलने आदि में आसानी हो गई। शादी भी कर ली जबकि इधर सी. प्रसाद, IAS, की एक पत्नी पहले से ही गाँव में है और उसके एक बच्चा भी है।

पत्नी को बाहर दौरे का बहाना बनाते हुए अपनी गाडी लेकर खुद सी. प्रसाद, IAS बारह साल बाद अकेले ही अपने गाँव के लिये निकल पडते हैं। गाँव के पास एक पुरानी यादों में बसे पकौडी की दुकान खोजते हैं। पता चलता है कि अब वो दुकान दूसरी जगह है। दुकान अब उस पुरानी दुकान के मालिक का लडका चलाता है। सी. प्रसाद, IAS, उस पकौडी की दुकान के पास गाडी खडी कर एसी चालू कर पकौडी का ऑर्डर देते हैं।

बारह साल बाद आँखों पर रेबेन का चश्मा लगाये सी, प्रसाद यह पकौडी खा रहे हैं कि तभी पकौडी वाला शीशे पर खटखट करता है। शीशा नीचे किया जाता है। पकौडी वाला झूरी, IAS सी. प्रसाद को पहचान जाता है।
आप वही हैं न हमारे इलाके के निकले बडे अफसर। इस इलाके से निकले अकेले आप ही तो हो। हमारे बाप ने बहुत पकौडी खिलाई है आपको।
हां।

भईया आप चिरई प्रसाद ही हो न।

चिरई प्रसाद। बरसों बरस बाद यह नाम उनके कान से टकराया था और वह हिल गये थे।
चिरई प्रसाद, सुत भगवंत प्रसाद, जाति अनुसूचित, ग्राम झंझौटी, तहसील राधेगंज, जनपद महमूदाबाद। यही दर्ज था सी. प्रसाद के बारे में यहां के स्थानीय कॉलेज के रजिस्टर में। ( चिरई = चिडिया )

चिरई प्रसाद सोचते जा रहे थे और गाडी चलाते जा रहे थे। दो बजते बजते सी. प्रसाद अपने गाँव की सरहद पर थे। उनके गाँव का बचपन का दोस्त निहुट मिल जाता है। शानदार लैड रोवर में बैठा निहुट ठंडी हवा खा रहा है। कुत्ते रूस्तम से उसकी दोस्ती हो जाती है।

ई सार कौन जाती का है ? बहुत लार चुआता है।

इसे कहते हैं रॉटवेलर। इसकी नस्ल उम्दा किस्म की है। इसे पालना आसान नहीं है।

का नाम है ! रांडपेलहर । बच्चा वच्चा हो तो एकाध इधर भी भेज दो।

रॉटवेलर बे ! यही तो मुश्किल है। अच्छी नस्ल की कुतिया तो मिले पहले।

अरे, तो कुत्ता ऐसा पालो जिसकी कि कुतिया भी हो ताकि जोडा खा सके।

यहां अरूण कुमार जी ने बहुत ही सहज तरीके से एक गँवई आदमी निहुट और एक IAS अफसर के बीच संवाद लिखे हैं।

कहानी आगे बढती है। चिरई प्रसाद घर पहुँचते हैं। बारह साल बाद घर पहुँचने पर घर में रूदन मच जाता है। महतारी अलग रोती है तो पत्नी अजीबा अलग। सांवली सी पत्नी को चिरई प्रसाद ध्यान से देखते हैं। बेटा लटूरे प्रसाद जो बारह साल का है वह भी भौंचक रहता है। उसे विश्वास नहीं होता कि सामने जो बैठा है वह उसका बाप है और बाहर जो शानदार गाडी खडी है उस पर उसका भी हक है। माँ जब अपनी सूखी छातियों से चिरई प्रसाद को लगाकर रोती है तो IAS अफसर चिरई प्रसाद असहज महसूस करते हैं और खुद को महतारी से अलग कर एक खाट पर बिठा देते हैं।

इस मिलन को अरूण कुमार जी ने अपनी सशक्त लेखनी से अमर बना दिया है।

थोडी देर बाद चिरई प्रसाद IAS को बाहर की तरफ कुछ आवाज सुनाई देती है। निकल कर देखते हैं कि उनका कुत्ता रूस्तम एक खजैली कुतिया से जोडा खा रहा है। संबंध बनाये हुए है। और निहुट लोहकार लोहकार कर उसका जोश बढा रहा था – अबे रूस्तम गाडी की सवारी से यह सवारी ज्यादा मजेदार है न।

अबे चिरई, देख अपने रूस्तम को। क्या शान से जोडा खा रहा है। स्साले अच्छी नस्ल के इंतजार में इसे बूढा कर रहा था।

चिरई परसाद को काटो तो खून नहीं। रूस्तम से उन्हें यह उम्मीद नहीं थी कि एक खजैली कुतिया से वह संबंध बना लेगा। एक लाठी लेकर दोनों को चिरई प्रसाद ने अलग किया।
साली बुजरी, हमारा ही कुत्ता मिला था।

इस घटना से चिरई प्रसाद को जैसे आघात सा लगा।

खैर, शाम को खाने पर सब लोग बैठे तो चिरई प्रसाद की पत्नी और मां ने एक गीत गाया। सहेली के रूप में खुश होकर गाये गीत का भावार्थ यह था कि

कहीं पर गिरा कंगना, कहीं पर नथुनी और कहीं पर गिरा माथे की टिकुली ।
उसे किसने पाया।
सास ने पाया कंगना, ननद ने पाया नथुनी और माथे की टिकुली बलम ने पाया है।
कैसे लोगी कंगना, कैसे लोगी नथुनी और कैसे लोगी टिकुली।
हंस के लूंगी कंगना, बिहंस के लूंगी नथनी और लिपट कर लूंगी टिकुली।

चिरई प्रसाद के कानों में जब अपनी पत्नी का स्वर टकराया कि लिपटि के लैहों टिकुली तो चिरई प्रसाद के मन के तार बज उठे। उन्होंने देखा कि अजीबा मुंह में पल्लू दबाए मुस्करा रही है और उनकी तरफ कनखियों से देख रही है।

रात होने को थी कि बचपन का मित्र निहुट पिये हुए आया। थोडी बहुत बकबक करने के बाद चिरई प्रसाद से बोला – बैंचो किसी काम का नहीं साला। अबे सोने की अंगूठी से तो अच्छी लोहे की मुंदरी होती है कम से कम सनीचर तो शांत करती है। महतारी बाप को छोड देवे तो कम से कम अपने लौंडा को तो देख। मेहरारू ( पत्नी) को तो देख।

चिरई प्रसाद का छोटा भाई पियक्कड निहुट से कहता है चलो तुम्हें अपने घर छोड आउं।
अरे, हमका का छोडबे । अपना भाई का उनके शहर में छोड आव तो एका असली रंग पता चली। स्साला चोट्टा , करनी न करतूत, पलरी जैसी चू.......।

कुछ और बक बक करने के बाद निहुट यह कहते लडखडाते कदमों से बाहर चला गया - बैंचो ले पकड अपने रांडपेलहर को।

यहाँ अरूण कुमार ने रात बिरात होने वाली बैठकी का अच्छा खाका खींचा है। किस तरह एक पियक्कड आदमी बक बक करता है और एकाध उसे उसके घर छोड आने का आग्रह करते हैं और पियक्कड है कि कुछ न कुछ सच –झूठ बोल बाल कर चल देता है औऱ उसके जाते ही पीछे रह जाती है उसके बारे में सोचने वाले की तंद्रा।

चिरई प्रसाद सोचते हैं साले सब यहीं रहेंगे इसी तरह पिछडे। एक मैं काम का निकल गया तो क्या सबको काम पर लगवाने का ठेका ले लिया है ?

सबके जाने के बाद देर रात चिरई प्रसाद अपनी सांवली पत्नी के पास जाते हैं। उससे संबंध बनाने की प्रक्रिया में पसीने से तर बतर पत्नी से उन्हें एक प्रकार की बू आती प्रतीत होती है। थोडी देर जब्त करने के बाद जब पत्नी के बदन से आती बू उन्हें असह्य हो जाती है तो यह कह कर हट जाते हैं कि –
हट् बुजरी! स्साली खजैली कुतिया।

इस कहानी ‘बुजरी’ के जरिये अरूण कुमार ने एक ऐसे शख्स की जिंदगी को पेश किया है जो चिरई प्रसाद से सी. प्रसाद, बना था और इस बनने बिगडने के क्रम में न जाने कितने अध्याय उसकी जिंदगी के ढंके हुए थे।

बेहतरीन वाक्य रचना और सशक्त लेखनी से ‘बुजरी’ कहानी, ने ‘हंस’ के अब तक के प्रकाशन इतिहास में एक और अध्याय जोड दिया है। अरूण कुमार जी को उनकी सशक्त लेखन क्षमता के लिये बधाई और राजेन्द्र यादव जी को यह कहानी पाठकों के सामने लाने के लिये धन्यवाद ।

यहां मैंने ‘बुजरी’ कहानी के कुछ अंशों को साभार ‘हंस’ से प्रकाशित किया है। पूरी कहानी और शब्द रचना का पूरा आनंद लेने के लिये ‘हंस’ के जुलाई 09 के अंक को पढें।


- सतीश पंचम

स्थान - मुंबई

समय - वही, जब सारा मीडिया हिलेरी हिलेरी गा रहा हो और खेत में खडा किसान सोच रहा हो कि उसका किसान हिल्लोरी गीत पढे लिखे बाबू , साहब-साहबान लोग क्यूँ गा रहे हैं।

Monday, 13 July, 2009

केंन्द्रीय ब्लॉगर अनुसंधान संस्थान


कल ही मैं केन्द्रीय ब्लॉगर अनुसंधान संस्थान गया था। पहुँचते ही रिसेप्शनिस्ट ने पूछा – क्या आप ब्लॉगर हैं ?

हां ब्लॉगर हूँ।

हिंदी में लिखते हो या अंग्रेजी में ?

हिंदी में।

किस लिये आये हो ?

बस ऐसे ही बैठा था तो सोचा एक चक्कर इस नवनिर्मित केन्द्रीय ब्लॉगर अनुसंधान भवन के लगा आउं।

सुनते ही रिसेप्शनिस्ट खुश हो गईं। ऐसा लगा जैसे एक किलो चाँद उनके चेहरे पर उतर आया हो। हाथ के इशारे से बताया, उधर चले जाइये। मिस्टर अनोखेलाल ब्लॉगरवाल जी हैं। उनसे मिल लिजिये। वो आपको ब्लॉग भवन की सारी जानकारी दे देंगे।
मैं चला गया श्री अनोखेलाल ब्लॉगरवाल जी से मिलने। मिलते ही बोले – अरे सतीश पंचम जी। सफेद घर वाले। आईये....आईये।
मैं सकपका गया। ये क्या ? इसको तो मेरा नाम भी मालूम है। जरूर ब्लॉगिंग में काफी रिसर्च वगैरह कर रखी होगी इसने। तभी तो फट से मेरा नाम बता दिया । मेरे चेहरे के भाव देख कर ब्लॉगरवाल जी ने कहा – अरे आप आश्चर्य न करें। हमें तो सभी ब्लॉगरों के नाम , पते मालूम हैं। हैं ही कितने आप लोग।
मैंने कहा – कहीं सुना था कि हिंदी ब्लॉगरों की संख्या लाखों- हजारों में हैं।
अरे , सब दिल कलंदर बाते हैं। सक्रिय तो चार साढे चार सौ के आसपास भी नहीं हैं।
अभी ये बातें चल ही रही थी कि ब्लॉगरवाल जी ने कहा- चलो तुम्हें अपने ब्लॉग भवन की सैर करा लाउं। मैंने भी हां कर दी। दोनों जन चल रहे थे कि एक शीशे की बडी सी अलमारी के पीछे किसी को बैठे देखा। पूछने पर पता चला कि ये कुढित ब्लॉगर हैं। इस प्रकार के ब्लॉगर कुढते रहते हैं और रह रह कर अपने को अनदेखा किये जाने की बात कहते रहते हैं।
मैंने कहा – तभी ये उस दीवाल की तरफ मुंह फेरकर खडे हैं।
आगे बढे। एक जगह कोई स्टॉल लगा था। किसम किसम के पैकेट रखे थे। पूछने पर पता चला ये ब्लॉगिंग के बीज हैं जो खेतों में डाले जाते हैं।
कुरेदने पर ब्लॉगरवाल जी ने बताना शुरू किया।

जैसे फसलों के बीजों के नाम होते हैं – सरजू बावन, सोनालिका, अर्जुन, लतिका, कर्मप्रिया, विजया, कर्णप्रिया, सोना -35, चमक -80......उसी तरह ब्लॉगिंग के बीजों के भी नाम हैं – विवाद प्रिया, टिप्पणी प्रिया, अनामी, अनामिका, मीडिया–52, पत्रकार-56, चिठेरा – 80, लती-100, और ऐसी ही ढेरों किस्में हैं।

मैं ब्लॉगिंग के इन बीजों को देखकर हैरान था कि क्या ऐसे भी ब्लॉगिंग के बीज होते हैं ? तभी ब्लॉगरवाल जी ने उन बीजों के बारे में एक एक कर बताना शुरू किया –

विवाद प्रिया – ये ऐसे बीज हैं कि एक बार खेतों में आप उल्टे हाथ से भी छींट दोगे तो ब्लॉगिंग की फसल लहलहा उठेगी। पहले एक टिप्पणी आयेगी फिर उसके प्रतिउत्तर में दूसरी टिप्पणी आएगी और फिर टिप्पणीयो का सिलसिला शुरू हो जायगा। ऐसे बीजों की मांग अक्सर आती रहती है। ब्लॉगर भाई लोगों की ये लोकप्रिय किस्म है।

मैं हां में हां मिला रहा था। कुछ समझ रहा था कुछ समझने का नाटक कर रहा था। ब्लॉगरवाल जी का बताना जारी था।
टिप्पणी प्रिया – ये ऐसे बीज हैं जिन्हें टिप्पणीयों के खाद पानी की जरूरत ज्यादा पडती है। समय से टिप्पणीयां न मिले तो ब्लॉगिंग की फसल जल्द मुरझा जाती है।

अनामी – ये ब्लॉगिंग के खर पतवार हैं। यहाँ वहाँ जब चाहे उग आते हैं। इन बीजों को कोई खरीदता नही है लेकिन जब ब्लॉगर भाई लोग किसी से दुश्मनी निकालते हैं तो एक दो बीज उसके खेतों में छींट देते हैं। कभी कभी तो सयाने ब्लॉगर भाई अपने ही खेतों में ये खर पतवार वाले बीज खुद ही छींट कर यह जताना चाहते हैं कि क्या करूँ मैं तो खुद इस खर पतवार से परेशान हूँ। इस बीज के कुछ जीन्स विवाद प्रिया जीन्स से मिलते हैं इसलिये इसे शंकर नस्ल भी कहा जाता है।

मीडिया – 52 – ये ऐसे बीज हैं जो मीडिया जगत से आये हुए हैं। जब हताशा की बयार चलने लगती है तो इस मीडिया 52 से उगी यह फसल ज्यादा गदराने लगती है। इस चैनल पर क्या है उस चैनल पर क्या है बताते हुए इससे निकली बालें आसमान को चूमती लगती हैं पर असल में होती जमीन पर ही हैं।

पत्रकार – 56- ये मीडिया 52 से मिलते जुलते नस्ल के हैं। इस पत्रकार छप्पन किसम की जो बीज है उसे पत्रकार अपने अखबार की क्यारी में नहीं बो पाते औऱ उसे ब्लॉग जगत की 56 किस्म की जमीनों पर ही बो देते हैं। फसल हो या न हो इसकी चिंता ही नहीं करते।

लती – 100 – ये ऐसे किस्म के बीज है जो ब्लॉगिंग के लती होते हैं। जब तक दिन में दो चार पोस्टें न फैला दें इन्हें चैन ही नहीं आता। काफी उपजाउ किस्म है पर क्वालिटी के मामले में अक्सर धोखा दे जाती है ये किस्म। लती 100 जहाँ बोई जाती है उस घर के सभी लोग हमेशा उसी खेत में लगे रहते हैं......पत्नी अलग कोसती है तो यार रिश्तेदार अलग ।

मैं अभी थोडा और घूमना चाहता था कि तभी एक रिसर्च साईंटिस्ट भागता हुआ ब्लॉगरवाल जी के पास आया – सर सर....वो विवाद प्रिया बीज से अंकुर फूटने लगे हैं और बगल में ही फॉलोवर वाली ट्रे भी भरने सी लगी है। जल्दी चलिये न पूरा ब्लॉग भवन इस बीज के लपेटे में आ जायगा।
ब्लॉगरवाल जी जल्दी से उस ओर बढ लिये जहाँ रिसर्च साईंटिस्ट ने घटना होने की बात की थी। मैं भी भागा भागा गया कि देखूँ क्या बात है।

पता चला कि विवाद प्रिया बीज ने विवाद खडा किया है कि पानी पीया जाता है कि गटका जाता है। बगल में ही टिप्पणी प्रिया बीज ने कहा कि पानी निगला भी जा सकता है। तभी लती-सौ टाईप का बीज बोल पडा - पानी सोखा जाता है। मैं सोच में पड गया – यार ये तो प्योर ब्लॉगिंग का बीज है। इससे ज्यादा शुध्द बीज तो कहीं और नहीं मिल सकता। बेहतर हो इन विवाद प्रिया बीजों से फासले बना कर रखूँ। यही सब सोचते हुए मैं ब्लॉग भवन से बाहर निकल रहा था कि तभी रेडियो पर एक गीत बजने लगा –

आप यूँ फासलों से गुजरते रहे
दिल पे कदमों की आवाज आती रही।
आहटों से अंधेरे चमकते रहे
रात आती रही, रात जाती रही
आप यूँ फासलों से गुजरते रहे.......

********************
( ये पोस्ट कुछ तो व्यंग्य और कुछ मजाकिया तौर पर लिखी गई है, इसे मजाक के तौर पर ही लें - केंन्द्रीय ब्लॉगर अनुसंधान संस्थान एक काल्पनिक नाम है। रेडियो से बजने वाला गीत सन 1977 का जां निसार अख्तर जी का लिखा गीत है)


-सतीश पंचम

समय – वही, जब खेतों में सूखे की जम्हाई, दूसरी ओर मायावती की मूर्तियों की लगवाई और दिल्ली में मेट्रो पुल की खुद ब खुद गिरवाई चल रही हो।

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